अवन्ती,अवन्तिका,उज्जयिनी आदि नामों से प्रसिद्ध उज्जैन एक ऐतिहासिक नगर है।सप्त मोक्षदायिनी पुरियों में से एक अवन्तिका पौराणिक,धार्मिक,साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक एवम् आर्थिक दृष्टियों में एक समृद्ध इतिहास धारण करती है।पौराणिक मान्यतानुसार यह चौरासी कल्प पुरानी है।यह नगरी प्रत्येक कल्प में विद्यमान होने से प्रतिकल्पा, भगवान् शिव द्वारा भक्तों का अवन् अर्थात् रक्षण किये जाने से अवन्तिका, त्रिदेवों की कृपा से प्राप्त समृद्धि के कारण कनकशृङ्गा, देवों के यहीं अमृत पीकर अमर होने के कारण अमरावती,निज बृहदाकार के कारण विशाला,ब्रह्मयज्ञों की बहुलता के कारण कुशस्थली,उत्कर्ष पूर्वक विजय प्रदान करने के कारण उज्जयिनी कही गयी है।

शिवपुराण,लिङ्गपुराण आदि शैवपुराणों में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग की इस स्थली की अनन्त महिमा कही गयी है। पद्म एवं ब्रह्मपुराण के अनुसार पुरी में भगवान् जगन्नाथ के विग्रह को स्थापित करवाने वाले राजा इन्द्रद्युम्न यहीं के सम्राट् थे।ब्रह्मपुराण में अवन्तिका के वैभव का वर्णन है। शिवपुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अनुसार गोपबालक श्रीकर की भक्ति से महाकाल प्रसन्न हुए थे।उसी श्रीकर की आठवीं पीढ़ी में भगवान् कृष्ण के पालक पिता नन्द का जन्म हुआ था।यह पावनपुरी जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली भी रही है।श्रीमद्भागवत में वर्णन है-

अथो गुरुकुले वासमिच्छन्तावुपजग्मतुः।

काश्यं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवासिनम्॥१०/४५/३१

अर्थात् गुरुकुल में अध्ययन करने हेतु श्रीकृष्ण काश्यगोत्री सान्दीपनि के आश्रम में आये और विद्या प्राप्त की।इससे ध्वनित होता है कि गीताज्ञान का बीज इसी भूमि में अङ्कुरित हुआ।स्कन्दपुराण - अवन्तीखण्ड के अनुसार वाल्मीकि, हनुमान् तथा अर्जुन का सम्बन्ध भी उज्जयिनी से रहा है। इस तीर्थभूमि में एक ओर महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग है तो वहीं हरसिद्धि,गढ़कालिका जैसे शक्तिपीठ,चिन्तामण गणेश, कालभैरव सदृश देवालय और सान्दीपनि आश्रम, भर्तृहरि गुफा सदृश सिद्ध तपस्थल विद्यमान् हैं।जगद्गुरु शङ्कराचार्य तथा महाप्रभु वल्लभाचार्य का सम्बन्ध भी उज्जयिनी से रहा है।

यदि यहाँ के राजनैतिक महत्त्व की चर्चा की जाए तो सर्वप्रथम मगधसम्राट् बिन्दुसार और अशोक का स्मरण होता है,जो शाषक बनने के पूर्व यहाँ के राज्यपाल रहे।चण्डप्रद्योत,उदयन, रुद्रदामन्,विक्रमादित्य, मुञ्ज,भोज,उदयादित्य,जयसिंह तथा महादजी सिन्धिया आदि राजपुरुषों का उज्जयिनी से निकट सम्बन्ध रहा है।

सम्राट् विक्रमादित्य और उनके नवरत्नों के बिना उज्जयिनी की चर्चा अधूरी ही रहेगी। प्रजावत्सल साहसाङ्क विक्रमादित्य ने आततायी शकों का उन्मूलन कर सुराज्य की स्थापना की और नवीन संवत्सर का प्रवर्तन किया।उनकी न्यायप्रियता,बुद्धिकौशल एवं सुशासन का अक्षुण्ण प्रभाव भारतीय जनमानसपटल पर है,तभी तो सिंहासन द्वात्रिंशतिका तथा वेताल पञ्चविंशतिका सदृश कथाग्रन्थ रचे गये।विक्रम के नवरत्नों में प्रमुख रूप से कविकुलगुरु की उपाधि से विभूषित कालिदास सदृश रससिद्ध महाकवि,अमरसिंह सदृश सुप्रसिद्ध कोषकार तथा त्रिस्कन्ध ज्योतिष के मर्मज्ञ आचार्य वराहमिहिर के नाम स्मरण होते हैं जिनकी रचनाओं का लाभ अद्यापि बहुसङ्ख्य संस्कृतानुरागी जन ले रहे हैं।लोककथाओं में विक्रमादित्य के अग्रज कहे गये उज्जयिनी के राजा और महान् योगी भर्तृहरि का विस्मरण भला कैसे कोई कर सकता है, जिनके शृङ्गारशतक,नीतिशतक और वैराग्यशतक में सम्पूर्ण मानवीय मनोविज्ञान का अध्ययन सहज ही हो जाता है।एक अन्य मान्यता के अनुसार भर्तृहरि व्याकरणदर्शन के मनीषी, शब्दब्रह्म के उपासक, वाक्यपदीय ग्रन्थ के रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं ।

इस मालवमाटी में साहित्य की सुगन्धि ऐसे एकाकार है कि यहाँ अनेक साहित्यकार जन्मे अथवा आकर्षित होकर यहाँ आ गये। भास के नाटकों प्रतिज्ञा यौगन्धरायण,स्वप्नवासवदत्ता तथा चारुदत्त में उज्जयिनी का उल्लेख मिलता है।इन नाटकों में उज्जयिनी के सदानीर सरोवरों, राजप्रासादों तथा वीथियों का वर्णन प्राप्त होता है।उज्जयिनी के राजा शूद्रक के मृच्छकटिक में भी इस नगर का वर्णन किया गया है।गुणाढ्य के प्राकृत ग्रन्थ बड्ढकहो (बृहत्कथा ) पर आधारित बृहत्कथामञ्जरी तथा कथासरित्सागर में भी उज्जयिनी की चर्चा प्राप्त होती है।कालिदास रघुवंश में महाकाल मन्दिर तथा राजप्रसाद का वर्णन करते हैं तो उज्जयिनी के प्रति उनका विशेष प्रेम मेघदूत में निकलकर आता है जबकि वे वक्रपन्थ होने पर भी मेघ को उज्जयिनी के समुन्नत भवनों की यात्रा पर ले आते हैं और यहाँ के उपवन,शिप्राऔर गम्भीरा नदी,बाजार आदि के दर्शन कराकर महाकाल की आरती में सम्मिलित होने का सङ्केत करते हैं।कालिदास के लिए उज्जयिनीदिवः कान्तिमत्खण्डमेकम्अर्थात् स्वर्ग का दैदीप्यमान् खण्ड है।बाणभट्ट तो कादम्बरी में नगरी के वैभववर्णन के साथ नागरिकों का भी विस्तृत परिचय प्रस्तुत करते हैं। दण्डी के दशकुमारचरित,सोढ्वल की अवन्तीसुन्दरी कथा, शङ्कराचार्य की सौन्दर्यलहरी,पद्मगुप्त के नवसाहसाङ्कचरित, श्रीहर्ष के नैषधीयचरित सहित अनेक ग्रन्थों में उज्जयिनी का वर्णन किया गया है।राजशेखर की काव्यमीमांसा के अनुसार तो यहाँ स्त्रियाँ भी संस्कृत बोलती थीं।इस नगरी में काव्यकारों की परीक्षा ली जाती थी।कालिदास,भर्तृमेण्ठ,अमरसिंह, भारवि आदि यहीं कसौटी पर कसे गये थे।

उज्जयिनी का कालगणना हेतु भी विशेष महत्त्व है।यहाँ के ज्योतिर्लिङ्ग का नाम भी महाकाल है।कर्करेखास्थित इस नगर में कर्कराजेश्वर मन्दिर है।राजा जयसिंह द्वितीय ने यहाँ वेधशाला का निर्माण कराया। आधुनिक काल में भी संस्कृत तथा अन्य विधाओं के विद्वानों की उन्नत परम्परा है। पं.सूर्यनारायण व्यास,डॉ.विष्णु श्रीधर वाकणकर,आचार्य बच्चूलाल अवस्थी,आचार्य वेङ्कटाचलम्,आचार्य श्रीनिवास रथ,श्रीकृष्ण सरल,प्रो. शिवमंगलसिंह सुमन आदि उज्जयिनी के दैदीप्यमान् पुञ्ज हैं।