VC’s Message

पुरोवाक



भारतवर्ष के हृदयस्थल मध्यप्रदेश की अविनाशी नगरी अवन्ती मोक्षप्रदायिनी तो है ही, कालिदास, भर्तृहरि, उव्वट, विक्रमादित्य, वराहमिहिर, सान्दीपनि, उदयन, वासवदत्ता सबकी स्मृतियों को झंकृत भी करती रहती है यहीं के सान्दीपनि ने गीता गायक श्रीकृष्ण का निर्माण किया था। महाकाल का सानिध्य मात्र विद्या की साधना का निदर्शक है। विक्रमादित्य की आराध्या हरसिद्धि और कालिदास की आराध्या गढ़कालिका यहीं है। कभी चिन्तामणि, कभी मंगलनाथ, कभी कालभैरव उज्जयिनी की कोई न कोई गाथा जोड़ते ही रहते हैं। मध्यप्रदेश शासन ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान, संस्कृति, संस्कार, आस्था, विश्वास, प्रबोधन, सम्बोधन के कालजयी प्रवाह को शाश्वत रखने के लिये ‘महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय’ की स्थापना की है। विश्व को अपनी विद्याओं का भास्वर प्रकाश देने हेतु प्रयास प्रारम्भ हो गया है। संगोष्ठियों, परिसंवादों, व्याख्यानों, सत्रों एवम् प्रस्तुतियों के द्वारा परिसर का अध्ययन-अध्यापन अपने नवोन्मेष का चरमान्वेषण करने लगा है। संस्कृत वाङ्मय का विराट् वैभव आत्मसात् कर विश्व को ज्योतिष्मान् और द्योतित करने का संकल्प शैशवावस्था में आ गया है। ज्ञानार्णव को तरंगित करने हेतु ग्रन्थालय पारम्परिक एवम् समसामयिक अध्ययन को सेतुबद्ध करने हेतु संगोष्ठियाँ अन्तस् की दृष्टियों को शब्दब्रह्म में परिणत करने हेतु व्याख्यानों का शुभारम्भ, वैदिक वाङ्मय, साहित्य, व्याकरण, ज्योतिष, दर्शन, पुराणेतिहास, शिक्षा आदि के सन्दर्भों में साम्प्रतिक ज्ञान-विज्ञान को बाँधने और बेधने लगा है। अपने अध्ययन की दिशा में प्रासंगिकता, समसामयिकता, व्यावहारिकता एवम् प्रयोगात्मकता को समाहित करता हुआ पारम्परिक एवम् शास्त्राभ्यास यथाशीघ्र संस्कृत जगत् में अपना स्थान प्राप्त कर लेगा, इसी विश्वास से संकल्प को साकार करने में प्रतिपद आश्वस्ति के साथ यह विश्वविद्यालय तत्पर है। ‘आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः’ का सन्देश परिसर में सत्यापित होने के लिये अपनी यात्रा का श्रीगणेश करने लगा है। मानकों और व्यापों को समेटने के लिये अपने क्षितिज पर अपना सूरज गढ़ने के लिये हम कृत संकल्पित हंै।

प्रो. रमेशचन्द्र पांडा